युवावस्था में बोरियत

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श्याम जब हाईस्कूल में था, तभी से उसे अभिनय और संगीत में दिलचस्पी था, लेकिन उसके माता-पिता ने उसे विज्ञान संकाय का चयन करने के लिए मजबूर किया । वह थियेटर और फिल्मों में अपना करियर बनाने के लिए एनएसडी (नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा) में प्रवेश लेना चाहता था, लेकिन उसके माता-पिता चाहते थे कि वह आईआईटी (भारतीय प्रौघोगिकी संस्थान) में हो , जो भारत के शीर्ष क्रम का इंजीनियरिंग कॉलेज है।

उसने एक कोचिंग संस्थान में प्रवेश लिया , जहां वे सुबह 7 बजे से दोपहर 1 बजे तक भौतिक, रसायन और गणित की कक्षाओं में भाग लेता था। इन कक्षाओं में जो भी पढ़ाया जा रहा था, वह एक शब्द भी समझे बिना केवल हर दिन कक्षा में घंटों बैठा करता था। वह कक्षाओं में बैठने इतना बोर हो गया कि वह खुद को निराशाजनक , उदास और लक्ष्यविहीन महसूस करने लगा। उसकी ऑंखें बोरियत से भरी हुई थी, लेकिन अब कुछ बचा नही था, क्योंकि उसके माता-पिता ने पहले से ही कोचिंग संस्थान को मोटी रकम जमा कर दी थी।

यह कई लाख युवा भारतीयों की कहानी है, जो बोरियत से लड़ते है, जबकि वे अपने वर्तमान में चल रहे कार्यो में रुचि नही रखते है और सक्रिय मामलों से खुद को अलग रखते है। युवायें अपने बोरियत से राहत पाने के लिए ड्रग , शराब और अन्य नशीले पदार्थों का सेवन करने में भी शामिल होने की कोशिश करते है।

अगर श्याम लगातार थियेटर से जुड़ा होता, तो वह निश्चित रुप से अपने लिए पहचान बना लेता क्योंकि उसके लिए दर्शकों के साथ जुड़ना बहुत ही स्वाभाविक था, जैसा कि उसने मंच पर प्रदर्शन किया , लेकिन नियति ने अपनी भूमिका निभाई। 

लचीलता और जागरुकता से बोरियत को दूर किया जा सकता है। कुछ चीजों में, बोरियत अंतदृष्टि और खोज में एक अग्रदूत का काम करता है। युवा मन के असहज स्थिति से जूझते है, जबकि वे बोर होते है। वे अपने खाली समय में अपनी ऊर्जा का प्रयोग और चैनेलाइज करते है, जो कभी-कभी अंतर्मन की खोज और आत्मजागरुकता का कारण बनता है। 

चित्रकार , कलाकार, शिल्पकार और विचारक समय के साथ अधिक रचनात्मक हो जाते है। जब वो पर्याप्त रुप से मशगूल हो जाते है, चूंकि बोरियत के दौरान वे बहुत सी कल्पना करते है, जिससे प्रशंसा योग्य बहुत सी अद्भुत वस्तुओं का निर्माण होता है। 

 खराब सौदे का सबसे अच्छा उपयोग करना

बोरियत अत्यधिक चाहने की इच्छा है। इसे दूर भगाने के बजाय रचनात्मक होने या स्थिति का सामना करके खत्म किया जा सकता है। पर्यावरण संरक्षण , पशु अधिकारों , परोपकारिता, आध्यामिकता और राष्ट्रवाद जैसे कारणों के लिए सक्रिय स्वयंसेवक बनने से आपको बोरियत से बाहर निकलने में मदद मिल सकती है। दुनिया भर के युवाओें ने विभिन्न मानवीय कार्यो को अपना लिया है और खुद को एनजीओं (गैर सरकारी संगठनों) के साथ जोड़ लिया है और अपनी क्षमता को रचनात्मक रुप से व्यस्त कर लिया है।

इससे बाहर निकलना –

संगीत सुनना, पढ़ना, पेटिंग करना और खेलना युवाओं द्वारा अपनाये गये कुछ ऐसे काम है, जिन्हें करने के लिए वे मन लगाकर काम करते है। जब एक युवा वही करता है, जो उसे अच्छा लगता है, तो वह कभी-भी बोरियत महसूस नही करेगा और एक अलग गतिविधि के कारण बोरियत पर काबू पाना भी आसान होगा। वह बस गहराई से उसे पाने की कोशिश में प्रयास करते है और उससे प्राप्त खुशी को याद करते है। जीने के वैकल्पिक तरीके चिकित्सा, ध्यान और उपचार (केवल यदि आवश्यक हो) तो मूड और अर्तमन को बदलने का कारण बनता है और मन को एक अलग मंच और ध्यान की ओर ले जाता है।

दलाईलामा के शब्दों में , ‘‘यह सबसे बड़ी कठिनाइयों के अंतर्गत है कि वहां खुद को और दूसरों के लिए अच्छा करने की सबसे बड़ी क्षमता मौजूद है।‘‘ 

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